कजरारे नैनों के निर्झर से क्यों अश्रु धारा बहती हो
तारतम्य चंचलता पे क्यों विषाद की बदली डाले हो
जीवन की विहंगमता को समझो क्लेदित ह्रदय को समझाओ
वक्त बीतने से पहले व्यथा को भरो और इठलाओ
संभालो तुम ख़ुद को न पथ से डगमगाओ ।
अडीग हो सजग हो और ये तुम न भूलो
संगम पे आ कर नदी रूकती नही है
सागर की बाँहों में जा कर ही रहती है ।
मंजील से नजरे हटने न पाए, इरादे की नैया हिलने न पाए
मानस मुकम्मल जमी की तड़प में मयस्सर माय को पिने न पाए ।
Saturday, November 7, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment