Saturday, November 7, 2009

हमसफ़र

तुने प्यार किया है नही की बेवफाई
फिर क्यों जवाने से हो इतना घबराई
अगर तेरे दामन मैं है सच्चाई
तो हंस कर के कह दे मुहब्बत निभाई ।
अरमानो के कब्र पे ताज खरा है
मुहब्बत का जिससे गौरव बढ़ा है
फिर भी उसकी उज्ज्वलता घटती नही है
पाषाणों की आहें लगती नही है ।

प्रयासरत

कजरारे नैनों के निर्झर से क्यों अश्रु धारा बहती हो
तारतम्य चंचलता पे क्यों विषाद की बदली डाले हो
जीवन की विहंगमता को समझो क्लेदित ह्रदय को समझाओ
वक्त बीतने से पहले व्यथा को भरो और इठलाओ
संभालो तुम ख़ुद को न पथ से डगमगाओ
अडीग हो सजग हो और ये तुम न भूलो
संगम पे आ कर नदी रूकती नही है
सागर की बाँहों में जा कर ही रहती है ।
मंजील से नजरे हटने न पाए, इरादे की नैया हिलने न पाए
मानस मुकम्मल जमी की तड़प में मयस्सर माय को पिने न पाए ।

जड़ जीवन 2

छलकते प्यालों की मादकता से मोहित
मय की कशक की समरसता से शोभित
मन के आगाज की जड़ता से पीड़ित
जज्बातों के झंझावातों से दोहित
उम्मीदों का दीया जीया में जलाये
पतन की निरंतरता को अपना बनाये
मानव तू ख़ुद से लड़ा जा रहा है ।
अपनी ही प्रखरता से जलता रवि
करे वो इशारा जो कहता कवि
बन हिंसा का प्रतिमान भावनाओं का गुलाम
श्रृष्टि की दृष्टि में डाले व्यवधान
नर्क की तड़प से है परेशान
फिर भी कष्टों को अपने गले से लगाये
तू अपनी जलन में जला जा रहा है .

जड़ जीवन

जाने कहाँ से आ कर खुशी ने
हौले से कहा मुझे ओ प्यारे
तुम्हारा सवेरा गोधुली से आगे
संध्या से निकल रजनी की आगोश में
जाने वाला है तू बढ़ कर बचा ले ,
अचानक से मैं भी बहुत घबराया ; फिर
संभाला ख़ुद को और समझाया
तंद्रा को ही तुने जीवन बनाया ;
जीने का ख्याल कहाँ से है आया
जब मौत को ही तुने महबूब बनाया ।
यहाँ इतनी है लालच इतनी है नफरत
किसी एक की खुशी से है सबको शिकायत
स्वार्थ के जलन की है सबको नफासत
हिम्मत नही की तू सह सके ये आफत
फिर कैसे करेगा तू जीने की हिमाकत ??
चलता रह जैसे तू चलता रहा है
मुर्दे की तरह जैसे जीता रहा है।

अभिवयक्ति

ओ चन्द्रबदन ओ मृगनयनी तेरी सुषमा का क्या कहना
तेरा इठलाना तेरा बलखाना हाय अदा से तेरा मुस्काना
तेरी करि चाल तेरा सिंह लंक कर देता सबको दीवाना
मैं भी तेरा आसक्त हूँ , पर ;
मैं नही चाहता प्रेम सूत मैं नही चाहता प्रणय पाश
बस परिचय की है अभिलाषा सामीप्य का कंचन एहसास
निज मन में वसित मूर्ति मेरी प्रेरणा के प्रखर श्रोत
हर ले तू मेरे जीवन का तम कर दे तू मुझको ओत प्रोत
सर्वस्व न्योछावर को तत्पर है हर पल मेरा रोम रोम
इसी उत्कट इप्सा से करता है ये उछ्रिन्कल मन सोम सोम

फैशन एक भ्रम

गौर बदन की प्रखर उज्ज्वलता
मोहक ननों की चंचल मादकता
विचारों की निर्मल शीतलता
जिसे देख पशन भी मचलता ।
फिर क्यों मौजों में बहती हो
फैशन के पीछे मरती हो
नारी तू ख़ुद माया क साकार रूप
फिर क्यों मायाजाल मैं फंसती हो ।
तेरी सादगी ही तेरा श्रृंगार हो
तेरा सोच तेरा अलंकार हो
तेरी यौवन ही तेरा ढाल हो
फिर क्यों न हर नर तुझपे निढाल हो ।

कर्मवान प्रसस्त नर

अपनी तन्हाई मैं दबा दबा , ख्यालों में अपने सहमा सहमा
जीवन की गोधुली की तलाश में , अपने सहारे की चाह में
प्रभु की दया की इप्सा से, क्यों भक्ति का ढोंगी हो चोल लगाये ?
अपनी पुरुषत्व को पहचान तू , सहारों की तुमको जरुरत नही है
संभालना लुढ़कना है जीवन की नियति, लुढ़क कर जो संभले वही है इन्सान ; उसको ही मिलता है इश्वर का प्यार।
लुढ़कता रहा तो कहे की भक्ति पिशाचों की दुनिया में है तेरा धाम ।