Saturday, November 7, 2009

जड़ जीवन

जाने कहाँ से आ कर खुशी ने
हौले से कहा मुझे ओ प्यारे
तुम्हारा सवेरा गोधुली से आगे
संध्या से निकल रजनी की आगोश में
जाने वाला है तू बढ़ कर बचा ले ,
अचानक से मैं भी बहुत घबराया ; फिर
संभाला ख़ुद को और समझाया
तंद्रा को ही तुने जीवन बनाया ;
जीने का ख्याल कहाँ से है आया
जब मौत को ही तुने महबूब बनाया ।
यहाँ इतनी है लालच इतनी है नफरत
किसी एक की खुशी से है सबको शिकायत
स्वार्थ के जलन की है सबको नफासत
हिम्मत नही की तू सह सके ये आफत
फिर कैसे करेगा तू जीने की हिमाकत ??
चलता रह जैसे तू चलता रहा है
मुर्दे की तरह जैसे जीता रहा है।

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