ओ चन्द्रबदन ओ मृगनयनी तेरी सुषमा का क्या कहना
तेरा इठलाना तेरा बलखाना हाय अदा से तेरा मुस्काना
तेरी करि चाल तेरा सिंह लंक कर देता सबको दीवाना
मैं भी तेरा आसक्त हूँ , पर ;
मैं नही चाहता प्रेम सूत मैं नही चाहता प्रणय पाश
बस परिचय की है अभिलाषा सामीप्य का कंचन एहसास
निज मन में वसित मूर्ति मेरी प्रेरणा के प्रखर श्रोत
हर ले तू मेरे जीवन का तम कर दे तू मुझको ओत प्रोत
सर्वस्व न्योछावर को तत्पर है हर पल मेरा रोम रोम
इसी उत्कट इप्सा से करता है ये उछ्रिन्कल मन सोम सोम
Saturday, November 7, 2009
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