Saturday, November 7, 2009

आत्म आलाम्भन

जीवन की इस मंझधार मैं ख़ुद से लडूं या अपनी तन्हाई से

निस्तरंग निर्जन मन में लहरों की मौज उठे कैसे

तंग हूँ बेचैन हूँ अपनी ही अच्छाई के अवशेष से

भावनाओं की निष्ठुरता से बच कर अग्रसर हूँ पतन के पथ पे ।

दोस्ती पे नही मुझे ऐतबार रिश्तों से नही मुझे कोई प्यार

मतलबी है ये दुनिया मतलब के हैं सब दोस्त यार

जो पास तुम्हे बुलाता है हंस गले तुम्हे लगता है

मुसीबत की मौजों में तुमको छोड़ वो चला जाता है

इसलिए मैं कहता हूँ हंस कर तुम कष्टों को अपनाओ

ये दर्द नही देगा तुमको ये दगा नही देगा तुमको

हलाहल वेदना को भी बन नीलकंठ तुम पी जाओ

तकदीर कितना भी मजबूर करे हालेदिल न कभी कहना

कोई सहानुभूति दिखला कर तुम्हे भिक्षुक तुल्य बनाएगा

कोई व्यंग बाण चला कर तुमको विनोद की वास्तु बनाएगा

चाहे कितना भी अपना हो वो दर्द नही बाँट पायेगा ।

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