जीवन की इस मंझधार मैं ख़ुद से लडूं या अपनी तन्हाई से
निस्तरंग निर्जन मन में लहरों की मौज उठे कैसे
तंग हूँ बेचैन हूँ अपनी ही अच्छाई के अवशेष से
भावनाओं की निष्ठुरता से बच कर अग्रसर हूँ पतन के पथ पे ।
दोस्ती पे नही मुझे ऐतबार रिश्तों से नही मुझे कोई प्यार
मतलबी है ये दुनिया मतलब के हैं सब दोस्त यार
जो पास तुम्हे बुलाता है हंस गले तुम्हे लगता है
मुसीबत की मौजों में तुमको छोड़ वो चला जाता है
इसलिए मैं कहता हूँ हंस कर तुम कष्टों को अपनाओ
ये दर्द नही देगा तुमको ये दगा नही देगा तुमको
हलाहल वेदना को भी बन नीलकंठ तुम पी जाओ
तकदीर कितना भी मजबूर करे हालेदिल न कभी कहना
कोई सहानुभूति दिखला कर तुम्हे भिक्षुक तुल्य बनाएगा
कोई व्यंग बाण चला कर तुमको विनोद की वास्तु बनाएगा
चाहे कितना भी अपना हो वो दर्द नही बाँट पायेगा ।

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