छलकते प्यालों की मादकता से मोहित
मय की कशक की समरसता से शोभित
मन के आगाज की जड़ता से पीड़ित
जज्बातों के झंझावातों से दोहित
उम्मीदों का दीया जीया में जलाये
पतन की निरंतरता को अपना बनाये
मानव तू ख़ुद से लड़ा जा रहा है ।
अपनी ही प्रखरता से जलता रवि
करे वो इशारा जो कहता कवि
बन हिंसा का प्रतिमान भावनाओं का गुलाम
श्रृष्टि की दृष्टि में डाले व्यवधान
नर्क की तड़प से है परेशान
फिर भी कष्टों को अपने गले से लगाये
तू अपनी जलन में जला जा रहा है .
Saturday, November 7, 2009
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